कैमूर जिला लंबे समय से अपने वन क्षेत्र और कृषि आधारित आजीविका के लिए जाना जाता रहा है। किंतु हाल के वर्षों में धान और गेहूँ की खेती के बाद खेतों में बची पराली को जलाने की समस्या यहाँ भी गंभीर रूप लेती जा रही थी। इससे न केवल पर्यावरण को नुकसान हो रहा था, बल्कि मिट्टी की उर्वरता, किसानों के स्वास्थ्य तथा पूरे क्षेत्र की पारिस्थितिकी पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा था।इस चुनौती को अवसर में बदलने का एक उल्लेखनीय प्रयास नाबार्ड समर्थित कैमूर हिल्स फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (FPCL) द्वारा किया गया है।
पराली जलाने की समस्या और उसके दुष्परिणाम
धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जलाना किसानों के लिए एक त्वरित लेकिन अत्यंत हानिकारक उपाय रहा है। पराली जलाने से कार्बन डाइऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड, मीथेन तथा सूक्ष्म कण (PM 2.5 और PM 10) वातावरण में फैलते हैं, जिससे वायु प्रदूषण बढ़ता है। इसका सीधा असर बच्चों, बुजुर्गों और खेतों में कार्य करने वाले किसानों के स्वास्थ्य पर पड़ता है।
साथ ही, पराली जलाने से मिट्टी के भीतर मौजूद लाभकारी सूक्ष्म जीव नष्ट हो जाते हैं, जिससे मिट्टी की जैविक गुणवत्ता घटती है। दीर्घकाल में इसका परिणाम उत्पादन लागत बढ़ने और फसल की उत्पादकता घटने के रूप में सामने आता है।
नाबार्ड समर्थित कैमूर हिल्स एफपीसीएल की अभिनव पहलइन्हीं समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कैमूर हिल्स फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड (FPCL) ने रामपुर प्रखंड के पसाईं पंचायत के अपने कार्यशील गाँवों में धान की पराली का व्यवस्थित संग्रह प्रारंभ किया है।

अपने पहले ही ऑपरेशन सीजन में एफपीसीएल ने 300 से अधिक एकड़ क्षेत्र से धान की पराली एकत्र कर एक महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत किया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि इन खेतों में पराली नहीं जलाई गई, जिससे पर्यावरण, मिट्टी तथा स्थानीय आबादी को प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त हुआ है।
हर सीजन में 800 एकड़ का लक्ष्य कैमूर हिल्स एफपीसीएल ने आने वाले समय के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किया है। कंपनी का उद्देश्य है कि धान एवं गेहूँ—दोनों फसलों के प्रत्येक सीजन में कम से कम 800 एकड़ क्षेत्र में पराली एवं कृषि अवशेषों का वैज्ञानिक प्रबंधन किया जाए।
यह पहल केवल पर्यावरण संरक्षण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसे किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने से भी जोड़ा गया है।
कृषि अपशिष्ट से स्वच्छ ऊर्जा का निर्माण
एफपीसीएल द्वारा एकत्र की गई धान, गेहूँ, सरसों और अरहर की फसलों से प्राप्त कृषि अपशिष्ट से ब्रिकेट्स (Briquettes) एवं पेलेट्स (Pellets) बनाने की योजना पर कार्य किया जा रहा है।ये ब्रिकेट्स और पेलेट्स कोयले का एक स्वच्छ, सस्ता और पर्यावरण-अनुकूल विकल्प हैं। इनके उपयोग से—
कोयले पर निर्भरता कम होगी।
ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी आएगी।
स्थानीय स्तर पर स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन संभव होगा।
इस प्रकार खेतों में बेकार पड़ी पराली अब प्रदूषण नहीं, बल्कि ऊर्जा और रोजगार का स्रोत बनती जा रही है।मिट्टी और कृषि पर दूरगामी सकारात्मक प्रभाव पराली न जलाने से मिट्टी की जैविक संरचना सुरक्षित रहती है। खेतों में मौजूद पोषक तत्व नष्ट नहीं होते और मिट्टी में सूक्ष्म जीव सक्रिय बने रहते हैं। इसका प्रत्यक्ष लाभ किसानों को इस रूप में मिलता है—
मिट्टी की उर्वरता एवं जल-धारण क्षमता में वृद्धि
रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता में कमी
दीर्घकाल में फसल उत्पादन का अधिक स्थिर एवं टिकाऊ स्वरूप
यह पहल कैमूर जिले में प्राकृतिक एवं सतत कृषि की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम के रूप में देखी जा रही है।
किसानों को मिलने वाले प्रत्यक्ष लाभ
इस नवाचार से किसानों को कई स्तरों पर लाभ प्राप्त हो रहे हैं—
1. पराली जलाने की मजबूरी से मुक्ति
किसानों को अब पराली निपटान के लिए हानिकारक उपाय अपनाने की आवश्यकता नहीं है।
2. अतिरिक्त आय का अवसर
कृषि अपशिष्ट अब एक आर्थिक मूल्य वाला संसाधन बनता जा रहा है।
3. सामूहिक शक्ति का विकास
एफपीसीएल के माध्यम से किसान संगठित होकर बाजार, तकनीक और संस्थागत सहयोग से सीधे जुड़ पा रहे हैं।
संस्थागत सहयोग और प्रशासनिक सराहना
इस पहल को एक्सेस डेवलपमेंट सर्विस (Access Development Service) द्वारा GAP कार्यक्रम के अंतर्गत सहयोग प्रदान किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य एफपीओ को सशक्त बनाना तथा कृषि-पारिस्थितिकी आधारित समाधानों को बढ़ावा देना है।
श्री नीलेश पटेल, जिला विकास प्रबंधक (DDM), नाबार्ड द्वारा निरंतर समीक्षा एवं मार्गदर्शन के साथ इस पहल की योजना, क्रियान्वयन तथा मॉनिटरिंग सुनिश्चित की गई, जिससे यह पहल सुचारु, समयबद्ध और प्रभावी रूप से आगे बढ़ सकी।
हाल ही में पराली संग्रह स्थल का दौरा जिला कृषि पदाधिकारी, DDM-NABARD, लीड डिस्ट्रिक्ट मैनेजर (LDM), कैमूर तथा RSETI निदेशक द्वारा किया गया। अधिकारियों ने इस पहल को पर्यावरण संरक्षण, किसान सशक्तिकरण एवं ग्रामीण आजीविका संवर्धन के लिए एक अनुकरणीय मॉडल बताया।
निष्कर्ष
धान की पराली, जो कभी प्रदूषण और चिंता का कारण थी, आज कैमूर जिले में स्वच्छ पर्यावरण, बेहतर मिट्टी और किसान समृद्धि का प्रतीक बनती जा रही है। नाबार्ड समर्थित कैमूर हिल्स फार्मर्स प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड का यह प्रयास दर्शाता है कि सही संस्थागत सहयोग, निरंतर मार्गदर्शन और सामूहिक प्रयास से कृषि अपशिष्ट को समस्या नहीं, बल्कि समाधान के रूप में अपनाया जा सकता है।यदि ऐसे प्रयासों को भविष्य में भी नीति, वित्त एवं तकनीकी सहयोग मिलता रहा, तो कैमूर जैसे क्षेत्र जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।






